छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच महानदी जल बंटवारे को लेकर चल रहे विवाद में दिल्ली की बैठक के बाद समाधान की उम्मीद बढ़ी है। अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी रही, जबकि दोनों राज्य CWC के फैसले को स्वीकार करने की बात पहले ही कह चुके हैं।
रायपुर: छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच पिछले चार दशकों से जारी महानदी जल बंटवारे की जंग में एक बड़ा मोड़ आ गया है। नई दिल्ली स्थित कर्तव्य भवन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक ने इस 43 साल पुराने जटिल विवाद को निपटाने की नई राह दिखाई है। बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी की मौजूदगी ने साफ कर दिया है कि अब इस मुद्दे को कानूनी पैंतरेबाजी के बजाय सीधी वार्ता और व्यावहारिक तालमेल से सुलझाने की तैयारी है।
भारत में कावेरी, कृष्णा और सतलुज-यमुना लिंक जैसे कई जल विवाद दशकों से अदालतों और ट्रिब्यूनल्स में लंबित हैं। महानदी विवाद भी साल 2018 से महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण के चक्कर काट रहा है। ऐसे में यदि दो बड़े राज्य कानूनी लड़ाई को दरकिनार कर गृह मंत्रालय की मध्यस्थता में मेज पर बैठकर समाधान निकालते हैं, तो यह भारतीय संघवाद के इतिहास में एक नई नज़ीर पेश करेगा। इस पूरे विवाद के केंद्र में महानदी का लगभग 46 मिलियन एकड़-फीट यानी करीब 567 खरब लीटर पानी है, जिसके न्यायसंगत बंटवारे को लेकर खींचतान चल रही है।
ओडिशा का तर्क, हीराकुंड बांध प्रभावित होगा
धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की लगभग 53 फीसदी जमीन महानदी के कैचमेंट एरिया में आती है और राज्य की कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा विकास परियोजनाएं इसी पानी पर निर्भर हैं। दूसरी ओर, ओडिशा का दावा रहा है कि ऊपरी इलाके में छत्तीसगढ़ द्वारा बैराज बनाए जाने से गैर-मानसून के दिनों में निचले हिस्से में पानी का बहाव घट जाता है, जिससे उसकी सिंचाई व्यवस्था और प्रसिद्ध हीराकुंड बांध प्रभावित होता है। दशकों तक यह विवाद दोनों राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें होने के कारण सियासी बयानबाजी में फंसा रहा। हालांकि, वर्तमान में केंद्र के साथ-साथ छत्तीसगढ़ और ओडिशा तीनों जगह एक ही दल की सरकारें हैं। ऐसे में गृह मंत्रालय की मौजूदगी में यह वार्ता होना यह साबित करता है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो दशकों पुरानी अंतर-राज्यीय समस्याओं का निपटारा तेजी से किया जा सकता है।तकनीकी अध्ययन और राज्यों के हितों पर जोर
बैठक का फैसला इस तरफ की इशारा करता है कि अब दावों और आरोपों के बजाय वैज्ञानिक आंकड़ों को प्राथमिकता दी जाएगी। केंद्रीय जल आयोग की देखरेख में जल प्रवाह, मानसून और गैर-मानसून अवधि में पानी की उपलब्धता का सटीक तकनीकी अध्ययन कराया जाएगा, जिससे दोनों राज्यों के हितों को संतुलित किया जा सके।ओडिशा के हीराकुंड बांध के हितों का भी पूरा सम्मान: सीएम साय
छत्तीसगढ़ के नजरिए से भी यह वार्ता बेहद अहम है, क्योंकि ट्रिब्यूनल में मामला लंबित होने के कारण राज्य की कई सिंचाई और औद्योगिक परियोजनाओं पर अनिश्चितता की तलवार लटकी हुई थी। बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने दोनों राज्यों की जीत का रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ अपने जल अधिकारों की रक्षा करते हुए ओडिशा के हीराकुंड बांध के हितों का भी पूरा सम्मान करता है। अदालती चक्रव्यूह और राजनीतिक गतिरोध से निकलकर महानदी का यह मामला अब ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है, जहां से निकलने वाला रास्ता पूरे देश के जल-प्रबंधन के लिए एक नया नक्शा तैयार कर सकता है।अगर यह प्रक्रिया किसी साझा समाधान तक पहुंचती है, तो वर्षों से चले आ रहे अंतर-राज्यीय जल विवाद को बातचीत और तकनीकी सहमति से सुलझाने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। फिलहाल नजर इस बात पर है कि दोनों राज्यों के हितों को संतुलित करते हुए CWC की प्रक्रिया किस निष्कर्ष तक पहुंचती है।
